जब अलाउद्दीन खिलजी की बेटी हो गयी थी इस राजपूत के प्यार में पागल

आजकल पद्मावती फिल्म को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। उसका कारण है फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली का एक मनगढंत विषय पर फिल्म बनाना जिसका असलियत से कोई लेना देना नहीं है। भंसाली ने खिलजी के पागलपन पर फिल्म जरुर बना दी लेकिन वो कभी प्रेम नहीं था बल्कि जो असल प्रेम था वह था खिलजी के बेटी फिरोजा का एक हिन्दू  राजकुमार वीरमदेव से प्रेम।

खिलजी की बेटी फिरोजा इस हिन्दू राजकुमार के प्यार में थी पागल
प्रतीकात्मक चित्र

बात 1297 है जब अलाउद्दीन खिलजी सोमनाथ पर आक्रमण कर आ रहा था। तो यह खबर जालौर के राजा कान्हड़देव चौहान को लगी। तब राजा कान्हड़देव चौहान ने तुरंत अपनी सेना तैयार कर जालौर से 18 मील दुर सकराना गांव में अलाउद्दीन की आ रही सेना पर आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन की सेनापति उलूग खां था। जो इस युद्ध में बुरी तरह घायल होकर दिल्ली भागने में कामयाब रहा किंतु कमाण्डर मलिक आईजुद्दीन और खिलजी का भतीजा मारा गया था।

महाराजा कान्हड़देव के पुत्र राजकुमार वीरमदेव ने बहुत अद्भुत वीर थे। राजकुमार केवल वीर ही नही बहुत सुंदर भी थे जिनकी चर्चा अलाउद्दीन के दरबार में भी होने लगी थी। तब अलाउद्दीन की बेटी फिरोजा यह सब सुनकर राजकुमार वीरमदेव पर मोहित हो गई। इसके पता लगाने के लिए उसने अपने गुप्तचर के साथ एक चित्रकार को जालौर भेजा।राजकुमार वीरम देव को देखकर कर चित्रकार ने चित्र बना ली और ले आकर खिलजी के बेटी फिरोजा को सौंप दिया।

राजकुमार वीरमदेव के चित्र को देखकर फिरोजा उनके प्यार में और पागल हो गई। उसने अपने पिता अलाउद्दीन खिलजी से वीरमदेव से शादी करने की बात कही। पहले तो खिलजी ने साफ इंकार कर दिया लेकिन बाद में फिरोजा की जिद के कारण उसे झुकना पड़ा। तब उसने राजा कान्हड़देव को सूचना भेजकर दिल्ली बुलाया और अपने बेटी के साथ वीरमदेव से शादी करने का प्रस्ताव रखा। तब राजा कान्हड़देव ने जवाब दिया था कि, इसका फैसला हम जालौर पहुंचकर अपने मंत्रियों के साथ इस विषय पर विचार कर आपको सूचना भेजेंगे।

लेकिन राजा कान्हड़देव ने जालौर आते ही उन्होनें अपने बेटे का खिलजी की बेटी के साथ शादी करने से इंकार कर दिया।बताया जाता है इस खबर को पाते ही खिलजी भड़क गया। तब खिलजी ने पहले युद्ध के परिणाम को याद कर कान्हड़देव पर सीधा आक्रमण करने के बजाए शातिराना चाल चली।

चूंकि खिलजी जानता था कि राजपूत ब्राह्मणों को बहुत आदर करते हैं। इसलिए उसनें अपनी सेना से ब्रह्मपुरी नामक ब्राह्मणों के ग्राम में आक्रमण करवा दिया। यहां पर उसके सैनिकों ने मंदिर भी तोड़ डाले थे और 45 हजार वेदपाठी ब्राह्मण को गिरफ्तार कर मारवाड़ ले जाने लगा।

45 हजार ब्राह्मणों के बंदी बनाए जाने के बाद राजा कान्हड़देव क्रोध से आग बबुला हो गयें तब उन्होने आस-पास के राजवाड़े से मदद मांगी जिसमें राठौड़,परमार , चंदेल ,सोलंकी,चावड़ा और यादव राजा भी आएं।युद्ध हुआ संगठित होकर लड़े सभी 45 हजार ब्राह्मणों को छुड़ा लिया गया और उनको घर भेज दिया गया।

इस हार के बाद खिलजी ने एक और बड़ी सेना भेजी और सीधे जालौर पर आक्रमण कर दिया। खिलजी की सेना विशाल थी। राजा कान्हड़देव खिलजी के शाहिन सहित 50 योद्धाओं को मार कर खुद वीरगति को प्राप्त हो गयें। अब युद्ध का सारा भार राजकुमार वीरमदेव और भाई मालदेव पर आ गया।

राजकुमार वीरमदेव अखण्ड ब्रह्मचारी थे वें तीन दिन तक लड़ते रहे इस युद्ध में उन्होनें 40 तलवार तोड़ी। खिलजी के सेनापति ने राजकुमार के सामने फिर से शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन उन्होनें इंकार करते हुए कहा—–
” जैसल घर भाटी लजै, कुल लाजै चौहाण। हुं किम परणु तुरकड़ी, पछम न उगै भांण।”

अर्थ— : ‘मामा जैसलमेर के भाटी और मेरा कुल चौहान दोनों लज्जित होगें। मैं मुस्लिम लड़की से विवाह उसी प्रकार नही कर सकता जिस प्रकार सूर्य पश्चिम से नही उग सकता।’

इस युद्ध में राजकुमार वीरमदेव भी विरगति को प्राप्त हुए। बताया जाता है कि, यह सूचना पाकर खिलजी की बेटी बहुत टूट गई थी जिसने दो दिन तक अन्न ग्रहण नही किया फिर उसने यमुना में कूदकर अपनी जान दे दी थी।

स्रोत : इतिहासकार दशरथ शर्मा की Early Chauhan Dynasties Page No : 179-80
नैणसी ख्यात भाग-दो, जो तीन सौ साल पुरानी पुस्तक है
इस प्रेम पर सबसे विस्तार से 1455 में लिखी कान्हड़देव प्रबन्ध पुस्तक में लिखी गई है
इसके अलावा यह प्रेम कथा एक और पुस्तक बांकीदास री ख्यात में भी है